राजस्व विभाग का महाघोटाला? बंटवारे से पहले नामांतरण और फिर कंपनी के नाम रजिस्ट्री! करोड़ों की पैतृक जमीन हड़पने के खेल में घिरे ‘साहब’

रायगढ़ / घरघोड़ा तहसील के ग्राम चारमार में एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने राजस्व विभाग की साख को पूरी तरह तार-तार कर दिया है। एक गरीब किसान परिवार की करोड़ों रुपये की पैतृक कृषि भूमि को रसूखदारों और भू-माफियाओं के हवाले करने के इस खेल में राजस्व अमले की भूमिका पर गंभीर और तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि विभाग के भ्रष्ट तंत्र ने नियमों को ताक पर रखकर इस महाघोटाले को अंजाम दिया है।
बिना कानूनी बंटवारे के कैसे हो गया नामांतरण?
पीड़ित पक्ष चिंतामणी गुप्ता एवं सरधाकर गुप्ता ने न्याय की गुहार लगाते हुए सीधा और गंभीर आरोप लगाया है कि उनकी लगभग 71.767 हेक्टेयर पैतृक भूमि आज भी संयुक्त खाते में दर्ज है। जब बंटवारे का मामला खुद नायब तहसीलदार न्यायालय में लंबित है, तो आखिर किस कानून के तहत बिना किसी वैध आदेश और बिना सभी हिस्सेदारों की सहमति के कुछ खास खसरा नंबरों का नामांतरण (म्यूटेशन) दूसरे व्यक्तियों के नाम पर कर दिया गया? यह सीधे तौर पर एक बड़े सुनियोजित खेल की तरफ इशारा करता है।
फर्जीवाड़े को छुपाने के लिए रिकॉर्ड में हेराफेरी!
मामले में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर मोड़ तब आया जब शिकायतकर्ताओं ने इस अवैध कार्रवाई का विरोध किया। आरोप है कि प्रशासन को शिकायत मिलने के बाद, अपनी गर्दन बचाने के लिए संबंधित राजस्व अभिलेखों (रिकॉर्ड) में रातों-रात गुपचुप तरीके से संशोधन कर दिए गए। यह कार्रवाई को जबरन ‘वैध’ दिखाने की एक नाकाम और शातिर कोशिश थी, जिसने सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
5 मई को कंपनी के नाम ‘अवैध’ रजिस्ट्री, विवाद के बीच धड़ल्ले से निर्माण
शिकायत के अनुसार, 5 मई 2026 को इसी विवादित भूमि की रजिस्ट्री ‘बी.एस. स्पंज प्रा. लि.’के पक्ष में कर दी गई। आरोप है कि यह पूरी रजिस्ट्री पूरी तरह से फर्जी और कूटरचित (जाली) दस्तावेजों के सहारे खड़ी की गई है।
हद तो तब हो गई जब मामला कोर्ट और प्रशासन के सामने होने के बावजूद, विवादित जमीन पर कंपनी द्वारा धड़ल्ले से बाउंड्री वॉल, पिलर और अन्य निर्माण कार्य शुरू कर दिए गए। पीड़ित पक्ष ने इसके पुख्ता वीडियो और फोटो साक्ष्य भी जुटाए हैं, जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि भू-माफियाओं को कानून का कोई खौफ नहीं है।
कलेक्टर की दहलीज पर मामला: क्या खुलेगी भ्रष्ट अफसरों की पोल?
यह मामला सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के संरक्षण में फल-फूल रहे एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश है। पीड़ित परिवार अब इस पूरे मामले को सीधे कलेक्टर के समक्ष उठाने की तैयारी में है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या प्रशासन इस पूरे फर्जीवाड़े की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों को जेल भेजेगा? या फिर रसूखदार कंपनी और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ के आगे एक बार फिर गरीब किसान का हक दबा दिया जाएगा? अब देखना यह है कि क्या विवादित भूमि पर अवैध निर्माण को तुरंत रोककर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होती है, या प्रशासन मूकदर्शक बना रहेगा।




