पत्रकार जगन्नाथ बैरागी ने वृद्धाश्रम में मनाया जन्मदिन..

बुजुर्गों की आँखों से छलके खुशी के आँसू..
दिखावे की चकाचौंध छोड़ आशा निकेतन वृद्धाश्रम पहुँचे पत्रकार बैरागी..
बुजुर्ग माताओं को साड़ी, पिताओं को वस्त्र, फल-मिष्ठान और आर्थिक सहयोग देकर लिया आशीर्वाद..
सारंगढ़ : अक्सर लोग अपने जन्मदिन की खुशियाँ होटलों की चकाचौंध, डीजे के शोर और दिखावटी दावतों में मनाते हैं। लेकिन जब कोई इंसान अपनी खुशी उन बुजुर्गों के बीच साझा करता है, जिनकी आँखें वर्षों से अपनों की राह ताकते-ताकते पथरा चुकी हों, तो वह दिन सिर्फ जन्मदिन नहीं, बल्कि मानवता का पावन पर्व बन जाता है।
कुछ ऐसा ही भावुक और दिल को छू लेने वाला नज़ारा देखने को मिला आशा निकेतन वृद्धाश्रम में, जहाँ पत्रकार जगन्नाथ बैरागी ने अपने जन्मदिन पर एक अनूठी और अनुकरणीय मिसाल पेश की। जगन्नाथ बैरागी ने इस विशेष दिन को दिखावे से दूर रखते हुए अपने पूरे परिवार के साथ वृद्धाश्रम के बेसहारा बुजुर्गों के संग मनाया।
जैसे ही पत्रकार बैरागी अपने परिवार के साथ वृद्धाश्रम पहुँचे, वहाँ का माहौल अपनत्व की खुशबू से महक उठा। उन्होंने आश्रम की सभी बुजुर्ग माताओं को सम्मानपूर्वक नई साड़ियाँ और पुरुष वर्ग को वस्त्र भेंट किए। इसके साथ ही सभी के लिए गरमा-गरम नाश्ता, मौसमी फल (सेब, केला), बिस्किट एवं नकद सहायता राशि सप्रेम भेंट की।
जब पत्रकार बैरागी ने झुककर बुजुर्ग माताओं के पैर छुए, तो कई माताओं की आँखों से खुशी और ममता के आँसू छलक पड़े। कांपते हाथों से उन्होंने जगन्नाथ के सिर पर हाथ रखकर दीर्घायु और यशस्वी जीवन का ऐसा आशीर्वाद दिया, जिसकी अनुभूति शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।
नन्हीं शिक्षा और आद्या की मुस्कान ने लौटाई चेहरों की चमक-
इस आयोजन का सबसे मार्मिक और खूबसूरत पहलू वह रहा, जब परिवार की नन्हीं बच्चियाँ शिक्षा और आद्या बुजुर्गों के बीच पहुँचीं। घर-परिवार और नाती-पोतों के प्यार से महरूम इन बुजुर्गों ने जब नन्हीं बच्चियों को अपने बीच खेलते, बतियाते और चरण स्पर्श करते देखा, तो वे अपने सारे दुख-दर्द भूल गए। बुजुर्गों ने घंटों बच्चियों को गोद में खिलाया और उनके साथ खेलकर अपने पुराने दिनों की यादें ताज़ा कीं।
घंटों बैठकर सुना बुजुर्गों का दर्द, बाँटा सुख-दुख-
पत्रकार और उनके परिजनों ने केवल औपचारिकता निभाकर विदाई नहीं ली, बल्कि घंटों तक सभी बुजुर्गों के पास बैठकर उनके सुख-दुख को सुना और साझा किया। आश्रम के वृद्धजनों ने बताया कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें पैसों या भौतिक वस्तुओं से अधिक अपनों के समय और मीठे बोल की दरकार होती है। पत्रकार परिवार के इस आत्मीय व्यवहार ने उनके अकेलेपन के घावों पर मरहम लगाने का काम किया।
पत्रकार जगन्नाथ बैरागी की इस संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकार की प्रशंसा अब प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर आम नागरिकों तक हर कोई कर रहा है। प्रशासनिक हलकों और प्रबुद्धजनों ने कहा कि एक सजग पत्रकार का समाज के प्रति यह कर्तव्यबोध वाकई सराहनीय है।
यह पहल समाज के हर वर्ग अधिकारियों, युवाओं और सामर्थ्यवान नागरिकों के लिए एक गहरा संदेश देती है कि फिजूलखर्ची छोड़कर अपने जीवन के खास पलों को ऐसे असहाय और एकाकी जीवन जी रहे बुजुर्गों के साथ मनाएं। बुजुर्गों की दुआओं में जो ताकत है, वह जीवन की हर राह को रोशन कर देती है।







